जीवन की उधेड़बुन !!

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आज फिर मैने अपनी कलम उठाई है। समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखूँ पर फिर भी दिल ने बेपरवाह लिखने की गुज़ारिश की है। मुझे नहीं पता की मुझे ऐसा क्यों महसूस होता है जेसे साँसे कुछ आधी अधूरी सी चल रही हों और आँखों में अजीब सी नमी ने कब्ज़ा किया हो। मेरे लिए जीवन की इस उधेड़बुन को समझ पाना कठिन प्रतीत होता है। ना जाने क्यों ऐसा महसूस होता है, हर वो पल जो दस्तक देने को है, मेरे दिल ने उस पल से उम्मीदों की उस एहम कड़ी को छोड़ने का वादा किया हो! में नहीं जानती की मुझे अपने जीवन से इतने गिले-शिकवे क्यों है !! ना जाने क्यों ऐसा महसूस करती हूँ की जीवन की इस दोड़ का हिस्सा बनना व्यर्थ है। पता नही क्यों ऐसा लगता है कि ज़िन्दगी का सबसे अहम् सिरा जैसे अधूरा सा है और जैसे मेरे जीवन में इन असंतुलित दरारों ने घर कर लिया है।

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जब कोई तिनका झाड़ से अलग होकर टूट जाता है तो उसे हवा का आसरा मिलता है, जब सितारा टूट जाता है उसे दुआ की आसरा मिल जाता है, परंतु जब किसी मनुष्य की अंतरात्मा पर खिलवाड़ होता है तब वह क्यों एकदम बेसहारा हो जाता है ! आखिर ऐसा क्यों ? ऐसे वक़्त पर तो उस अन्तरात्मा में छिपी हर दुआ भी रोने लगती है तथा मनुष्य झिंझुर कर रह जाने को मजबूर हो जाता है। ऐसे हालतों में दुनिया का हर रंग बेरंग लगने लगता है। पता नहीं क्यों आज अपने दिल को समझा नहीं पा रही हूँ , पता नहीं क्यों लड़ रही हूँ मैँ खुदसे! मैं नहीं जानती की मेरी खुदसे ये लड़ाई कब खत्म होगी।!

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मैं दुखी आ गई हूँ अपने जीवन की इस उधेड़बुन से। अब मुझे इससे मुक्ति चाहिए। कभी कभी तो मन करता है खुदा से भी लड़ बैठू और कहुँ उसको की केसा खुदा है तू !! जो तेरी इतनी भी नहीं चलती की मेरे जीवन की इस उथल-पुथल को थामने का कोई नायाब फरमान जारी कर पाये तू और फिर ये सब थम जाये जीवन के आगोश में। पर फिर भी मैं उम्मीद करती हूँ की जीवन की ये उधेयधबुन, बेचैनी और उथल-पुथल का मंज़र थम जाये किसी दिन।

jhalli kudi

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